Friday, June 13, 2014

स्वर्ग में विचरण करते हुए
अचानक एक दुसरे के सामने
विचलित से कृष्ण
प्रसंचित राधा
कृष्णा सकपकाये
राधा मुस्करयी
इससे पहले क्रस्ना कुछ बोलते
 राधा बोल उठी
कैसे हो द्वारकाधीश ?

जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा
बुलाती थी
उसके मुख से द्वारकाधीश
का सम्बोधन कृष्णा को भीतर
तक घायल कर गया
फिर भी किसी तरह
अपने आप को संभाल लिया और बोले
राधा से
में तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
 तुम तो द्वारकाधीश मत !

आओ बैठते है
कुछ में अपनी कहता हूँ
कुछ तुम अपनी कहो
सच कहूँ राधा
जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आंसुओं
की बूंदे निकल आती थी
बोली राधा मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
 तुम्हारी याद आई न कभी आसु बहा
क्यूंकि हम तुम्हे कभी
भूले ही कहाँ थे
जो तुम याद आते
इन आँखों  में सदा तुम रहते थे
कहीं आसुओं के साथ निकल जाओ इसलिए
रोती  भी नहीं थी ई

प्रेम से अलग होने पर
तुमने क्या खोया
इसका एक आियणा दिखाऊँ आपको ?
कुछ कड़वे प्रशन सुन पो तो सुनाऊँ

कभा सोचा इस तरकी
में तुम कितना पिछड़ गए
यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और
समुन्द्र के खरे पानी तक पहुंच गए

एक उंगली पर चलने वाले
सुधर्षण चक्र
पर भरोसा कर लिया
पर दस उँगलियों पर चलने वाली
बासुरी को भूल गए ?
कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत को
उठकर लोगो को विनाश से बचाती थी

प्रेम से अलग होने पर
वही ऊँगली क्या क्या रंग दिखने लगी
सुदर्शन चक्र उठा कर
विनःस के काम आने लगी

कान्हा और करिहना में क्या हे फर्क होता है
बताऊँ
कान्हा होते तो तुम सुसुदमा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता

युद्ध औऔर प्रेम में यही तो फर्क होता है
युद्ध में आप मिटा कर जित्तते हैं
 प्रेम में आप मिट कर जीतते हैं

कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह  पर किसी को   दुःख नहीं देता

आप तो कई कलाओं के स्वमी हो
स्वपन दूर द्रष्टा हो गीता जैसे ग्रन्थ  के दाता हो
पर आपने क्या निर्णय किया
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंपडी ?
और अपने आप को पांडवों के साथ कर  लिया

सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो रपालक होता है
उसका रक्षक होता है

आप जैसा ज्ञानी उस रथ को चला रहा था
जिसपर बैठा अर्जुन
आप ही की प्रजा को मार रहा था
अपनी प्रजा को मरते देख
आप को करुणा नहीं आअई ?
क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे

आज भी धरती पर जा जार देखो
अपनी द्वारकाधीश वाली छवि को
ढूंढते रह जाओगे
हर घर में , हर मंदिर में
मेरे साथ ही  खड़े नजर आओगे
आज भी मैं मानती हूँ
लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते हैं

मगर धरती  के लोग युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं
पर प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं
गीता में मेरा  दूर दूर तक नाम भी नहीं
पर आज भी लोग उसके समापन पर
राधे राधे करते हैं

बोलो राधे राधे !












Tuesday, April 15, 2014

Valentine Day

Valentine ka hai utsav


kahan dhoondhe tumhe ab,

galiyaan ho gayee viraan

jaati thi jo tumhare paas,

aur bund pade hain ghar ke darwaaje ,

karti thi tum jahan raj.

Kisne tumhe bulaaya ,

aisee bhi kyaa jaldi thi ,

beeta varsha bana diya ,

rulaai aur vidaai ka parv....

Na hamse kuch kahaa,

Na hamaari sunee,

chali gayee hamaari dono ma,

rah gayee sooni unkahi.

Ab dhoondhte hain tumhe ,

gulshan aur gulzar main,

taaron bhari raat mein,

bahtee nadi ki dhaar mein

aur koyal ke pukar mein.

Ab yuva dilon ki dhadkan mein,

Nanhe bachhon ki muskaan mein

bujurgon ki aas mein

basee hai tumhari yaad.

Hai shristi ke har kan mein

ab tumhaaraa vaas,

par yeh bhi to sach hai,

milenge kabhi nahi, hum, ab is sansaar mein.



( Happy Valentine day and to my mother and mother in law who both passed away past year)

Tuesday, August 14, 2012

raysofhope-mala: raysofhope-mala: Independence Day

raysofhope-mala: raysofhope-mala: Independence Day

raysofhope-mala: Independence Day

raysofhope-mala: Independence Day

Independence Day


              एक शाम की बात

न मनोवैज्ञानिक , या अध्यापिका की नज़र से
वर्णन कर रही हूँ।
बस आम आदमी के कलम से
लिख रही हूँ।
क्या पाया , क्या खोया
हमने और देश ने
स्वतन्त्र भारत के इस पर्व पे
सोच रही हूँ।

देखती हूँ , की शहर की सीमायें
गाँव छू रहीं हैं
और उनके आगन बुद्धे और सूने
हो गये हैं।
बहुत सारे माल पाए हैं
शहर ने ,
और उन्हें आबाद करने के लिए
नौजवान खोये हमने।
माल के बाथरूम में विदेशी
कपडे पहेंते , और दुकानों की
mannequin से होड़ करती लड़कियां.
बाँहों में हाथ डाले यहाँ के युवा 
न दर है यहाँ किसी पंचायत, या खप का।
पर  सोचती हूँ क्या , अंग्रेजी गाने की गूँज 
कहीं दबा न दे स्वतंत्रता की हूक
और विलायती मुखोटे की पीछे
संस्कृति न तोड़ दे दम.

और बाहर सडकों पर  कुछ 
और आलम है.
बड़ते हुआ कचरे के ढेर
खाली पन्नियाँ गुटके और चिप्स के
दीवारों और सीढ़ियों पर 
तम्बाकू और पान के धब्बे .
गाढ़ी काली उबलती नालियाँ .

राजधानी मैं रहती हूँ
वास्तविकता का वर्णन कर रही हूँ
इसके लिए कोई नेता नहीं है
जिम्मेदार .
यह सब हम आम लोगों की है बात
स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहेले
की शाम की बात







  

Thursday, June 2, 2011

Wednesday, June 16, 2010

Passing moment

To rise and fall on curving line of life,
is human destiny.
No angels we are, nor is earth heaven,
our path is thorny .
How long you lie, splintered and weakened
is anyone’s guess.
For intent on self, no passerby stops,
and a hand will lend;
Nor does someone from nearby house ,
take you in.
You can, must wait, for wind to blow,
and dry the blood.
Dress and heal wounds that
must hurt.
And ignite the flame that has died.
And when you stand on your legs
Be sure the hands will shield
the flame that is weak.
Made strong by each step;
every breath.